Ruined Temple of Bhitrkot : (Gorakhpur, Deori ) Raisen
भीतरकोट ग्राम गोरखपुर ( देवरी जिला रायसेन ) का परमारकालीन शिवालय :
साथियों सभी को नमस्कार। जैसा कि मैंने पिछले ब्लॉग में रायसेन जिले के प्रमुख ऐतिहासिक मंदिरों के बारे में जो अब गुमनाम है पर कभी भव्य देवालय रहे है उन पर ब्लॉग लिखा था और यह भी बताया था कि रायसेन जिले के गांव गांव में परमार कालीन प्राचीन मंदिर स्थित रहे हैं पर किन्हीं कारणवश आज यह मंदिर नष्ट प्राय स्थिति में है या पूरी तरह खंडित हो चुके हैं। पर यदि हम किसी भी गांव में जाएंगे तो हमें वहां निश्चित ही किसी मड़िया में या किसी पेड़ के नीचे प्राचीन परमार कालीन मूर्तियां अवश्य सुरक्षित स्थिति में रखी मिल जाएंगे जिन्हें आज भी ग्रामवासी पूजा करते हैं और ऐतिहासिक धरोहर मानते हुए इन मूर्तियों को संरक्षित किए हुए हैं ।
कई जगह पुराने मंदिरों पर नए मंदिरों का निर्माण होकर इनमें प्राचीन मूर्तियों को धरोहित कर लिया गया है पर अभी भी कई ग्रामो में यह मंदिर और हमारी ऐतिहासिक धरोहर इनके पुनरुद्धार होने का राह देख रही है। आज के ब्लॉग में ऐसे ही एक प्राचीन और भव्य मंदिर के बारे में आपके सामने कुछ जानकारी रखूंगा जो यकीनन अपने समय में एक भव्य शिव मंदिर रहा होगा पर आज उसकी स्थिति इस प्रकार है कि एक-एक पत्थर को तोड़कर अलग कर दिया गया है और कुछ भी इन खंडित मूर्ति के अलावा वहां कुछ नहीं बचा है। प्राकृतिक कारणों से इस प्रकार खंडन नहीं हो सकता है यक़ीनन इसे इतने बुरी तरह से नष्ट किया गया है कि आज यहां चारों तरफ सिर्फ मंदिर के अवशेष ही दिखते है और यह कि किसी समय यहां एक प्राचीन भव्य देवालय रहा होगा। यह स्थान है गोरखपुर गांव जो कि देवरी ( जिला रायसेन ) से लगभग 4 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
देवरी गांव में तालाब के किनारे एक हनुमान मंदिर है जहां कई प्राचीन मूर्तियां रखी हुई है। ग्राम में माता बाई के चबूतरे पर लगभग 12वीं 13वीं सदी की कई प्रतिमाएं रखी हुई है। इन प्रतिमाओं में कीचक प्रतिमा जो सर पर भर उठते हुए दर्शाया है, नायिका प्रतिमा, विष्णु मस्तक प्रतिमा, पार्वती प्रतिमा आदि मुख्य है। यह तालाब भी प्राचीन है और इसकी बनावट भी यह दर्शाती है की यह तालाब भी बड़े पत्थरो जो आकार में एक सामान है और अच्छे से घाटो को बनाया गया है पर आज यह भी अपनी दुर्दशा पर सोचकर दुखी अवश्य होता होगा। आज यह भव्य तालाब भी अपने पुनःउद्धार की रह देख रहा है।
तालाब के पास एक पीपल का विशाल पेड़ है और उसके नीचे काफी मूर्तिया रखी हुई है जैसे मंदिर का शिखर, विष्णु मस्तक , गणेश मूर्ति और अन्य मूर्तिया। पास में एक मंदिर भी जिसमे एक शिवलिंग है जो अधिक प्राचीन नहीं है पर नंदी की मूर्ती खंडित है और परमारकालीन है। मंदिर में एक हनुमान जी की नवीन मूर्ति है। विष्णु मस्तक एक आले में रखा हुआ है और 11 वी सदी का प्रतीत होता है।
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| भीतरकोट में मंदिर के चारो तरफ रखी हुई मूर्तिया |
देवरी में 25 किलोमीटर लंबी पहाड़ी पर कुल 206 चित्रित शैलाश्रय भी पाए गए हैं जिसकी खोजकर्ता है श्री एम रफीक हैं। यहां मानव आकृतियां एवं पशुओं के चित्रों की बहुलता है जो गेरूये और काले रंग से अंकित किए गए हैं। हालाँकि इन शैलाश्रयों तक मैं इस बार नहीं पहुँच पाया क्योंकि कोई भी स्थानीय व्यक्ति इनके बारे में सटीक जानकारी नहीं दे पाया और समयाभाव के कारण भी यहाँ तक नहीं पहुँच सका। यह कितने दुःख की बात है की हम लोगो को हमारी धरोहर की ही जानकारी नहीं है जबकि आज के समय में हम दीन दुनिया की खबर रखते है पर हमारे नजदीकी में कितनी अनमोल प्रागेतिहासिक काल की धरोहर है इसके बारे में हमें नहीं पता है और न ही जानने का कोई प्रयास करते है।
यह सब प्रतिमाएं किसी प्राचीन परमार कालीन मंदिर का हिस्सा रही हैं और स्थानीय लोगों ने इनको यहां पर एकत्र कर लिए हैं, इससे यह तो स्पष्ट है कि आसपास ही कोई प्राचीन परमार कालीन मंदिर रहा है पर प्रश्न उठता है कि वह मंदिर कहां है और किस स्तिथि में है ??
इसका उत्तर मिलता है ग्राम गोरखपुर से लगभग 2 किलोमीटर की दूरी पर जंगल में स्थित भीतरकोट नामक स्थान पर। यह स्थान घने जंगल के अंदर स्थित है और गोरखपुर वन परिक्षेत्र देवरी का हिस्सा है। यहाँ अंदर जाने के लिए वन विभाग की अनुमति के साथ आप अंदर जा सकते है।
भीतरकोट नाम से ही स्पष्ट है कि यह किसी कोट या चार दीवारी के अंदर का क्षेत्र रहा होगा। यह स्थान पहाड़ी की तराई में है और घने जंगल में है। यहां पर एक काली माता का प्राचीन मंदिर है जिसमें स्थानीय लोग पूजा करने आते हैं और इस मंदिर के चारों तरफ भी कई प्राचीन मूर्तियां रखी हुई है। मंदिर में माँ काली की काळा पत्थर से निर्मित मूर्ति है और काफी प्राचीन है। यह सभी प्रतिमाएं दसवीं से 11वीं सदी की मध्य की है जिसमें नायिका प्रतिमा, विष्णु प्रतिमा, नंदी प्रतिमा भार वाहक कीचक प्रतिमा, मंदिर का स्तंभ भाग, सूर्य की स्थानक प्रतिमा आदि है पर अधिकांश भग्न स्थिति में है। कई बड़े क्षेत्र में मंदिर के पुरा अवशेष फैले हुए है। मंदिर के सामने ही पत्थरो का एक चबूतरा बना हुआ है जो कि प्राचीन प्रतीत होता है। मंदिर के पीछे दो विशालकाय पत्थर के खम्बे गढ़े हुए है।
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| जंगल में फैले हुए मंदिर के अवशेष |
काली माता मंदिर के पीछे तरफ चलने पर धीरे धीरे मंदिर के अवशेष मिलने लगते है और एक दीवाल यहाँ से भी निकली है। यह एक शोध का विषय है कि यहाँ आखिर क्या हुआ था और और मंदिर इतनी बुरी अवस्था में खंडित किस प्रकार हुआ कि इसके अवशेष इतने बड़े क्षेत्र में फ़ैल गए और मंदिर के नाम पर सिर्फ मंदिर का प्लेटफॉर्म ही बचा है। मंदिर के द्वार का चौखट का एक विशाल हिस्सा भी मलबे में है। आपस में लड़ते हुए दो हाथी का भी एक पैनल जंगल में मिला जो मंदिर का ही हिस्सा रहा होगा। कई कीचक की मूर्तिया भी जमीन पर यहाँ वह बिखरी हुई है।
अधिकांश मूर्तियों में सूर्य एकावली हार, कुंडल, कटि सूत्र तथा वनमाला धारण किए हैं। सूर्य के दाएं बाएं उषा प्रत्यूषा खड़ी है और बीच में सारथी अरुण है। नीचे पादपीठ पर पांच घोड़े का अंकन है यह प्रतिमा बेसाल्ट पत्थर पर निर्मित है। इसे भीतर कोर्ट नाम से जाने वाला यह स्थान पर प्राचीन मंदिर के कई भग्नावशेष हैं जिसमे मंदिर प्रवेश द्वार के द्वारा शाखा, कुबेर और हाथी युग्म लड़ते हुए, कीचक आदि को प्रदर्शित किया गया है।
संभावित है यहाँ एक परमार कालीन भव्य देवालय रहा होगा। पर इस मंदिर को इस प्रकार खंडित किया गया है कि सिर्फ पत्थर ही चारों तरफ दिखते हैं। मंदिर का आधार प्लेटफॉर्म ही शेष बचा है। पर यह हमारे इतिहास का यह दुर्भाग्य है कि इतना महत्वपूर्ण स्थान आज गुमनाम है और इसके बारे में कही कोई जानकारी नहीं है, धीरे धीरे यह सब भी नष्ट हो जायगा और आगे आने वाली पीढ़ी इस बारे में जान ही नहीं पाएगी। यदि हम लोग ही हमारा इतिहास नहीं जानगे तो आगे आने वाली पीढ़ी को क्या जानकारी होगी। रायसेन के पुरातत्व विभाग को यहाँ एक शोध करना चाहिए और जो कुछ भी आज बचा हुआ है उसे सहेजने का प्रयास करना चाहिए।
रायसेन की विशाल दीवाल : Great wall of Raisen
चीन की विशाल दीवार के बारे में तो आप सभी ने सुना ही होगा और इसके बारे में पढ़ा भी होगा। पर क्या आप जानते है कि भारत की विशाल दीवार कहाँ है और क्या आपने इसके बारे में कभी सुना है ??
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| गोरखपुर ग्राम से निकली हुई दीवाल |
हम में से अधिकांश लोग इस तथ्य के बारे में नहीं जानते कि रायसेन की दीवार जिसे भारत की महान दीवार भी कहा जाता है देवरी के गोरखपुर ग्राम से ही निकलती है। यह दीवार गोरखपुर ग्राम से निकल कर चौकीगढ़ किले जो कि बाड़ी तहसील में स्तिथ है और गोंडकालीन एक भव्य और दुर्गम किला है वहां तक जाती है। यह दीवाल 80 km लम्बी है और लगभग 15-20 फ़ीट चौड़ाई है और इसकी ऊंचाई भी 15-20 फ़ीट तक की है। इसकी मुख्य विशेषता यह है कि यह इंटरलॉकिंग पत्थरो से बनाई गयी है।
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| ग्राम गोरखपुर रायसेन की विशाल दीवाल |
यह दीवाल कब बनाई गयी और क्यों बनाई गयी यह अभी भी रिसर्च का विषय है हालाँकि एक तथ्य यह है कि इसे परमार वंश के शासको द्वारा निर्मित किया गया जो उस समय के कल्चुरी शासकों के बीच एक सीमा का निर्धारण करती थी और कलचुरियो के हमले से भी बचने के लिए उपयोगी थी। यह दीवाल आज भी एक विस्तृत शोध का विषय है। मैंने भी गोरखपुर से आगे मोघा डैम तक इस दीवार को देखा जो लगभग 10 km की दूरी पर है। यहाँ तक दीवाल जंगल और पहाड़ी पर होते हुए निकली है और मोघा डैम से आगे निकल गयी है। इस दीवाल पर मै अलग से एक ब्लॉग लिखने का प्रयास करूँगा और चौकीगढ़ तक आपको इसके बारे में बताने का प्रयास करूँगा क्योंकि चौकीगढ़ किला मैंने विजिट कर लिया है उसे भी उसी ब्लॉग में शामिल करूँगा। इस दीवाल को भारत की सबसे लम्बी दीवाल कहा जाता है। पर सरंक्षण के आभाव में यह जीर्ण शीर्ण होती जा रही है।
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| कालीमठ में माता मूर्ति |
भीतरकोट (देवरी) ग्राम गोरखपुर तक कैसे पहुंचे : How to reach Bhitarkot (Deori )
भीतरकोट रायसेन जिले की देवरी तहसील के अंतर्गत गोरखपुर ग्राम में स्तिथ है। यहाँ तक आने के लिए बस से रायसेन जिले मुख्यालय से बस मिल जायगी पर यह स्थान जंगल में होने से किसी स्थानीय व्यक्ति को साथ में अवश्य लाये और निजी वहां से ही आना होगा क्योंकि यहाँ के लिए वाहन नहीं मिलेंगे।
चित्र दीर्घा भीतरकोट ( गोरखपुर) : Photo Gallery Bhitarkot (Gorakhpur )
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24 Comments
👌👌🙏nice sar ji
ReplyDeleteThanks awadhesh
DeleteUndescribed information 👌👏
ReplyDeleteThanks a lot
DeleteBeautiful article
ReplyDeleteThanks deepesh
DeleteNice
ReplyDeleteV nice sir
ReplyDeleteBahut hi sundar prastuti h sir
Thanks a lot
DeleteVery Nice sir ji 👌👌
ReplyDeleteThanks saloni
Deleteरायसेन जिला इतनी पुरासंपदा से भरा पड़ा है जिसकी लोगो की कोई जानकारी नहीं है कई लोग इन्हें देख लेते है धार्मिक महत्व से इनको नमन कर लेते है किन्तु इनके ऐतिहासिक ज्ञान और महत्व को नहीं जानते आपकी प्रस्तुति ऐतिहासिक महत्व को दर्शाती है इसे सजाकर और संवारकर रखना अति आवश्यक हैं प्रस्तुति के लिए कोटिश बधाई और धन्यवाद
ReplyDeleteThanks a lot 🙏
DeleteExcellent sir ji
ReplyDeleteThanks a lot
DeleteExcellent sir,Shandar
ReplyDeleteThanks
DeleteGreat work sir👍🙏🏻
ReplyDeleteThanks divya
Deleteमैं भी इस स्थान पर जा चुका हूं ।
ReplyDeleteThanks
DeleteUndescribed information Sir ji
ReplyDeleteThanks a lot
ReplyDeleteExcellent sir a great blog thanks for yr great efforts👌👌👍👍
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